बुधवार, 21 जनवरी 2009

प्रेम सहजवाला जी की नजर से साया की कुछ कविता

रंजना जी
बहुत इंतज़ार के बाद आप से भेंट होने पर बेहद खुशी हुई. मेट्रो में लौट रहा था तो आप की सभी क्षणिकाएं पढ़ गया. इनमें से कौन सी सर्वश्रेष्ठ व कौन सी कम श्रेष्ठ यह कहना मुश्किल. पर नीचे दो उदाहरण दे रहा हूँ.
यूँ ही कभी कभी /दिल करता है की चुरा लूँ आसमान/ का नीला रंग सारा/ चाँद को बिंदी बना कर माथे पे सजा लूँ/ और दिल में जमी गरमी को/ बंद मुट्ठी से खोल कर गरमा दूँ/तेरे भीतर जमी बर्फ को / सुन कर वो बोला मुझ से / कि तू इतनी पगली क्यों है.
दुनिया के इस शोर में/बस चुपके से कह देना प्यार का एक बोल/पी लूंगी मैं बंद आंखों से/जो कहा तेरी आँखों ने.
मेट्रो में ही कविता 'बातें' पढ़ गया तो मन को बहुत गहराई तक छू गई. वैसे आप नारी संवेदना में खूब रची बसी सी लगती हैं. इतना निश्छल प्यार बहुत कम कविताओं में मिलता है. पर आप ने कमियों को बताने की बात कही है. मैं पढ़ते समय इस बात के प्रति सजग था कि यह सम्बंधित कवि का प्रथम संग्रह है. संवेदना लिजलिजी नहीं लगती बल्कि बहुत स्वाभाविक लगती है. जो बात मुझे महसूस हुई वह यह कि जब हम किसी अभिनेत्री की प्रथम फ़िल्म देखते हैं तो कहते हैं कि उस ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई है. आप की ये तमाम कवितायेँ भी लगभग एक ही विषय में फँसी हुई सी हैं, सो यही कहा जा सकता है कि इस में आपने अपनी भूमिका बखूबी निभाई है. आप फर्स्ट डिविजन में तो आयी हैं पर विषयों की विविधता आपके भावी संग्रहों में आशान्वित होगी जिस का अर्थ यह नहीं कि ये विषय आप को छोड़ना है. इस प्यार के विषय पर यदि इस से काफ़ी अधिक गहरी चीज़ें आप के पास हैं, तो उन्हें भी काव्य यात्रा में शामिल करें.
मैं समीक्षक नहीं हूँ वरन मैं तो मूलतः कथाकार रहा। इसलिए मेरी बातों में कोई निर्णयात्मक स्वर नहीं है, अलबत्ता ईमानदारी से मैं ने अपनी बातें कही है. आज की यह मेल आप की कविताओं पर प्रतिक्रिया की पहली किस्त है. कुछ और mails भी भेजूंगा. ...
धन्यवाद
प्रेम सहजवाला
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