सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

छंद मुक्त कविताओं की पहेली और साया

प्रेम जी आज कल मेरी किताब साया की कविताओं की समीक्षा बहुत दिल से कर रहे हैं ..बहुत कुछ नया जानने को भी मुझे उनसे मिल रहा है ..बहुत से मेल इसकी तारीफ में मिल रहे तो .पहला काव्यसंग्रह होने के कारण कुछ न कुछ कमी भी रह गई है इस संग्रह में ..प्रेम जी ने इस बार बहुत ही रोचक अंदाज़ में पहेली पूछते हुए कविताओं के बारे में लिखा है ...वो जैसा मेल में लिखते हैं वह मैं वैसा ही यहाँ पोस्ट कर देती हूँ ..अब यह पहेली रूपी छंद यहाँ है देखते हैं आप में से कितने लोग इसका सही उत्तर दे पाते हैं :)



रंजना जी,
पिछली बार आपकी कवितायेँ 'मेट्रो' में पढ़ी थी. अक्सर मैं कविताओं के साथ साथ उन्हें पढ़ने की जगह और समय को ले कर भी बहुत मूडी हूँ. मैंने तो अजमल खाँ पार्क में चीड के वृक्षों के नीचे तनहा बैठ कर भी कवितायेँ पढ़ी, तो कभी ट्रेन के आने के इंतज़ार में platform के बेंच पर बैठ कर भी. पर 'मेट्रो' में वो सुविधा कहाँ. ... ज़रा platform के एक छोर से दूसरे छोर तक टहलो तो 'मेट्रो' आ गई समझो. अन्दर बैठने की जगह मिले तो गनीमत, नहीं तो खड़े खड़े खयालों के स्टेशन पार करते रहो. बहरहाल, जब सारा शहर सो जाए, तब चारों तरफ़ फैली शान्ति किसी बुद्धिजीवी को एक वरदान से लगती है, और मुझ जैसा व्यक्ति ऐसे में अपने अध्ययन कक्ष में बैठा सुंदर सुंदर कविताओं का आनंद लेता है. तब कविता भी एक अलौकिक वरदान सी लगती है. मैंने कुछ रोज़ पहले 'साया संग्रह उठाया और उसकी कविताओं के वरदान को आगे आत्मसात करना शुरू किया. पर इस से पहले कि मैं आपके संग्रह की बहुत सुंदर छंद-बद्ध कविताओं पर कुछ लिखूं, यह मेल तो है छंद-मुक्त कविताओं पर कुछ दो टूक बातें कहने को. बुरा इसलिए न मानियेगा कि आप के सामने आलोचक नहीं, एक सुधी पाठक है, जो कविता पठन के ऊंचे ऊंचे आकाश उड़ चुका है. अब 'कामायनी' और 'उर्वशी' का युग कब का लद चुका है. इसलिए उस दौर के बाद की बहुत उत्कृष्ट छंद-मुक्त कविताओं के कुछ उद्धारण दे रहा हूँ. जैसे :

'उस दिन जब तुमने फूल बिखेरे माथे पर/ अपने तुलसी दल जैसे पावन होंठों से/ मैं सहज तुम्हारे गर्म वक्ष में शीश छुपा/ चिड़िया के सहमे बच्चे सा हो गया मूक/ लेकिन उस दिन मेरी अलबेली वाणी में/ थे बोल उठे, गीता के मंजुल श्लोक ऋचाएं वेदों की'.

एक रचनाकार मित्र होने के नाते इन सुंदर पंक्तियों के कवि का नाम बतौर पहेली के आपसे जानना चाहूँगा। बताइये, ये किस उत्कृष्ट कवि की पंक्तियाँ हैं. क्या इतने अपनेपन में लिखी प्रतिक्रिया में, कोई पहेली-नुमा सवाल आप बुरा मानेंगी? क्या options दूँ? तो लो॥ and the options are (a) भवानी प्रसाद मिश्र (b) भारत भूषन अगरवाल (c) धर्मवीर भारती (d) सुमित्रानंदन पन्त


फ़िर मुझे अक्सर एक गीतकार की ये प्रसिद्ध छंद-मुक्त पंक्तियाँ भी याद आ रही हैं:

द्वार रखने बंद हैं जो/एक खिड़की खोल रखना/ जिंदगी बाहर तुम्हें मिलने कहीं आयी न हो.
Options : (a) गोपालदास नीरज (b) कुंवर बेचैन (c) सुभद्रा कुमारी चौहान (d) रामावतार त्यागी
जब छंद-मुक्त कविताओं का युग आया, तो यह माना गया कि यदि छंद से मुक्त हुए हैं तो उसमें लय ज़रूर होनी चाहिए. पर चोटी के चंद कवियों को छोड़ कर धीरे धीरे छंद-मुक्त कविता एक उद्योग सा बन गई और कविता पठन में 'झेलने' जैसे मुहावरे डालने पड़े. कुछ घुसपैठिये इस प्रकार भी लिखने लगे:
मित्रो, सदा सच बोलो/ शराब मत पियो/ माँ बाप का कहना मानो/ यही सभ्यता है.
आश्चर्य कि चंद ऐसे कवियों को मंच से शेर की तरह गरजते देखा और कविता के 'क' तक को न समझने वाले लोगों को एक जुनूनी तरीके से तालियाँ बजाते देखा.
मैं आख़िर कहना क्या चाहता हूँ? आपको कविता का आसमान भी दिखा दिया, और रसातल भी. क्या मैं यह कहना चाहता हूँ कि मैंने तो धूमिल की 'संसद से सड़क तक' भी पढी है और मुक्तिबोध की 'चाँद का मुंह टेढा है' भी, और भवानी प्रसाद मिश्र की 'बुनी हुई रस्सी' पढ़ी है, सो मैं ऐसी वैसी चीज़ भला कैसे पसंद करूंगा? मैं तो पाँच सितारा होटलों में जा चुका हूँ, सो मैं छोटे मोटे रेस्तरां में क्यों बैठूंगा? नहीं. मुझे इस बात का बखूबी एहसास है कि साधारण रेस्तरां में भी बहुत उयादगार स्वादिष्ट चाय मिल सकती है, सो मैंने रात एकांत में 'साया' पढ़ते पढ़ते एक पन्ना ढूंढ लिया, जो सचमुच, न केवल नायाब सा लगा, वरन बेहद सच्ची और ईमानदार अभिव्यक्ति भी, जो कवि कहलाने की पहली शर्त है, जो आपको उन कवियों से दूर छिटक देती है, जो तालियाँ बजवाते हैं. वह कविता ये है:

सुबह की उजली ओस/ और गुनगुनाती भोर से/ मैंने चुपके से एक किरण चुरा ली है/ बंद कर लिया है इस किरण को/अपनी बंद मुट्ठी में/ इसकी गुनगुनी गर्माहट से/ पिघल रहा है धीरे धीरे/ मेरा जमा हुआ अस्तित्व/ और छाँट रहा है/ मेरे अन्दर का/ जमा हुआ अँधेरा/ उमड़ रहे हैं कई जज़्बात/ जो कैद हैं कई बरसों से/ इस दिल के किसी कोने में/ भटकता हुआ सा/ मेरा बावरा मन/ पाने लगा है अब एक राह/ लगता है अब इस बार/ तलाश कर लूंगी मैं ख़ुद को/ युगों से गुम है/ मेरा अलसाया सा अस्तित्व/ अब इस की मंज़िल मैं ख़ुद बनूंगी!!॥

रंजना जी, बनिए आप ख़ुद ही मंज़िल, कविता का रास्ता लंबा है, शुभकामनाओं के शजर रास्ते में खड़े हैं, आपको अपनी छांव में बिठा कर आगे की ताकत देने के लिए, और आपके असंख्य पाठकों की ये शुभकामनाएं शायद उनकी उमीदों की बुनियादों पर खड़ी हैं, उन्हें काव्य रस से सींचना आप की ज़िम्मेदारी है. आज बस इतना ही, अभी कुछ और छंद-मुक्त कविताओं पर लिखूंगा. हो सकता है, कहीं मुझे भी कुछ 'झेलना' भी पड़ा हो...
धन्यवाद
प्रेमचंद सहजवाला
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